कावड़ यात्रा -

क्या है कांवड़ यात्रा?



किसी पावन तीर्थ जैसे हरिद्वार से कंधे पर गंगाजल लेकर आने और अपने घर के नजदीक भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों पर चढ़ाने की परंपरा ‘कांवड़ यात्रा’ कहलाती है। सावन में भगवान महादेव की और भक्तों के बीच की दूरी कम हो जाती है। इसलिए भगवान को प्रसन्न कर मनोवांछित फल पाने के लिए कई उपायों में एक उपाय कांवड़ यात्रा भी है, इसे शिव को प्रसन्न करने का सहज मार्ग माना गया है।
बता दें कि सावन माह में कांवड़ में जल भरकर शिवलिंग या ज्योतिर्लिंग पर चढ़ाने की मान्यता है। कहा जाता है कि शिव जी ने सावन माह में ही विषपान किया था। इसलिए उस विष की ज्वाला को शांत करने के लिए जलाभिषेक करने का विधान बना। माना जाता है कि कांवड़ के जल से शिव जी का जलाभिषेक करने से जीवन की तमाम समस्याएं दूर होती हैं। मान्यता है कि इससे अकाल मृत्यु का डर भी समाप्त हो जाता है।

कांवड़ यात्रा – शास्त्रविरूद्ध साधना

हमारे शास्त्रों में मनुष्य जीवन को अति दुर्लभ बताया है। मनुष्य जीवन पाकर मानव भक्ति नहीं करता वह जीवन को बर्बाद करता है।
वर्तमान में हिन्दू धर्म में जितनी भी भक्ति पूजा साधना चल रही है वास्तविकता में वह शास्त्र विपरीत भक्ति है जिससे लोगों को भक्ति करते हुए भी कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं हो रहा।

ऐसी ही एक साधना सावन के महीने में कांवड़ यात्रा होती है। कांवड़ यात्रा करने का किसी भी शास्त्र में प्रभु का निर्देश नहीं है। कांवड़ यात्री सैकड़ों हजारों किलोमीटर पैदल चलकर गंगा जल लाते हैं। उनके पैरों तले करोड़ों सूक्ष्म जीव मरते हैं। यह काल का एक सुनियोजित जाल है। बरसात के दिनों में अनेक सूक्ष्मजीव बिलों से बाहर निकल धरती पर आ जाते हैं ऐसे में कांवड़ यात्री पुण्य कमाने के उद्देश्य से पैदल चलता है तो उनके पैरों के नीचे करोड़ों सूक्ष्मजीव मर जाते हैं जिसका पाप उनके सिर पर रखा जाता है। कबीर साहिब ने कहा है:- करत है पुण्य, होत है पापम् ।
वह पुण्य कमाने शिवजी को प्रसन्न करने चला था और करोड़ों जीव हत्या का पाप अपने सिर ले आया।

हमारे शास्त्रों में मनुष्य जीवन को अति दुर्लभ बताया है। मनुष्य जीवन पाकर मानव भक्ति नहीं करता वह जीवन को बर्बाद करता है।
वर्तमान में हिन्दू धर्म में जितनी भी भक्ति पूजा साधना चल रही है वास्तविकता में वह शास्त्र विपरीत भक्ति है जिससे लोगों को भक्ति करते हुए भी कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं हो रहा।

ऐसी ही एक साधना सावन के महीने में कांवड़ यात्रा होती है। कांवड़ यात्रा करने का किसी भी शास्त्र में प्रभु का निर्देश नहीं है। कांवड़ यात्री सैकड़ों हजारों किलोमीटर पैदल चलकर गंगा जल लाते हैं। उनके पैरों तले करोड़ों सूक्ष्म जीव मरते हैं। यह काल का एक सुनियोजित जाल है। बरसात के दिनों में अनेक सूक्ष्मजीव बिलों से बाहर निकल धरती पर आ जाते हैं ऐसे में कांवड़ यात्री पुण्य कमाने के उद्देश्य से पैदल चलता है तो उनके पैरों के नीचे करोड़ों सूक्ष्मजीव मर जाते हैं जिसका पाप उनके सिर पर रखा जाता है। कबीर साहिब ने कहा है:- करत है पुण्य, होत है पापम् ।
वह पुण्य कमाने शिवजी को प्रसन्न करने चला था और करोड़ों जीव हत्या का पाप अपने सिर ले आया।

वर्तमान में सतगुरु रामपाल जी महाराज सभी धर्मशास्त्रों गीता वेद एवं संतों की वाणियों से प्रमाणित भक्ति विधि बता रहे हैं जिससे साधक को अद्भुत भौतिक और आध्यात्मिक लाभ हो रहे हैं।
अत: प्रिय मानव समाज से निवेदन है शास्त्रविरूद्ध साधना त्यागें और शास्त्र अनुकूल साधना ग्रहण करें। इससे मानव जीवन का कल्याण सुनिश्चित होगा।


देखिए शास्त्र प्रमाणित सत्संग-
“साधना चैनल” प्रतिदिन रात्रि 7:30 से 8:30″

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